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एक राज़ – जो वो कह न सकी

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कम्प्यूटर इंजीनियर शीतल, देहरादून की एक बड़ी कम्पनी में अच्छे ओहदे पर कार्यरत है। सागर भी उसी कम्पनी में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत है।
साथ रहते-रहते पता ही नहीं चला कि कब दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे।

14 फरवरी, वेलेंटाइन डे पर सागर शीतल से इज़हार-ए-इश्क करता है, “क्या तुम मेरी हमसफ़र बनोगी?”

शीतल भी सागर को चाहती थी। एक पल के लिए उसने सोचा कि वो अपने अतीत के बारे में सागर को बताए, मगर फिर किसी के कहे शब्द याद आ गए:
“अगर समाज में इज्ज़त से जीना है तो आज के बाद न तुम हमें जानती हो और न हम तुम्हें। मानों आज तुम्हारा नया जन्म हुआ है, अपने अतीत को गहरी खाई में फेंक दो, उधर मुड़कर कभी मत देखना।”

और शीतल ने अपने उस अतीत पर, जो वो कह न सकी, पर्दा डाल दिया। उसने सोचा कि कहीं मेरा अतीत जानकर सागर मुझसे मुंह न मोड़ ले। इसलिए सब कुछ भूलाकर उसने मौन धारण करते हुए सागर के हाथों को अपने हाथों में लेकर सहमति जता दी।

सागर ने उसकी सहमति पाकर खुशी से उसे गले लगा लिया।

सागर ने अपने माता-पिता को बताया कि वह शीतल से प्यार करता है, लेकिन शीतल अनाथ है। सागर के माता-पिता नए ख़यालात के थे, इसलिए उन्होंने सहर्ष इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया। उनका बेटा जिसे प्यार करता है, उन्हें वही स्वीकार है।

चट मंगनी और पट ब्याह वाली बात हुई, और दोनों की शादी कर दी गई।

शादी के अगले ही दिन, हिजड़े यानी कि मंगलामुखी परिवार बधाई गाने के लिए आया।
लेकिन जैसे ही मंगलामुखियों ने घर के अंदर कदम रखा, दुल्हन को देखते ही उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान आ गई। इधर दुल्हन उन्हें भी देखते ही हक्की-बक्की हो गई और थोड़ा घबरा गई।

उसे घबराया हुआ देखकर मंगलामुखियों की मुखिया ने आंखों से कुछ इशारा किया। शीतल ने चैन की सांस ली, मगर उस वक्त उसकी आंखों के सामने वो मंज़र फिर से ताज़ा हो गया जब वह बारहवीं कक्षा के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में देहरादून स्कूल ट्रिप पर आई थी।

लगभग रात के दो-तीन बजे, मंगलामुखी टोली हरिद्वार से लौटी। ट्रेन से उतरते ही उन्होंने देखा कि सामने वाली रेल की पटरी के बीचों-बीच एक लड़की चल रही है और उधर से ट्रेन की आवाज़ भी सुनाई दी।

उसका इरादा समझते ही एक मंगलामुखी ने दौड़कर उसे पटरी से खींच लिया और अपनी मुखिया के पास लाई।
मुखिया बोली, “ए लड़की, अगर तुझे पकड़ते न तो जानती हो, तुम्हारी जान जा सकती थी।”

“तो क्यों पकड़ा मुझे? क्यों बचाया? मर जाने देते,” रोते हुए लड़की ने कहा।

मुखिया समझ गई कि लड़की किसी बहुत बड़ी परेशानी में है। उसे अपने पास बिठाया और प्यार से उसके सिर पर हाथ रखकर बोली,
“बेटी, ऐसी कौन सी मुसीबत आई थी कि तू ईश्वर की दी हुई नेमत (ज़िन्दगी) को खत्म करने चली थी? ज़रा सोच, तेरे इस कदम से तेरे माता-पिता पर क्या बीतेगा?”

“अगर माता-पिता होते तो आज मुझे आत्महत्या करने की नौबत ही नहीं आती।”

“ओह… बेटी, मुझे अपनी माँ समझो और बताओ कि तुम आत्महत्या क्यों करने जा रही थी?”

लड़की ने बताया कि वह, यानी शीतल, अम्बाला की रहने वाली है। बचपन में माता-पिता की मृत्यु के बाद मासी ने उसे पाला। शीतल पढ़ाई के साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती ताकि मौसा उसे बोझ न समझें।

शीतल बारहवीं कक्षा में थी, और एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में देहरादून जाना था। मौसा अकेले भेजने से इंकार कर दिए।
“लेकिन मौसा जी, बाकी लड़के-लड़कियां भी तो जा रहे हैं।”
“लड़के भी हैं, इसलिए तुम्हें उनके साथ नहीं भेज सकता। तू हमारी ज़िम्मेदारी है। तू प्रोजेक्ट के समय उनके साथ रहेगी, उसके बाद हम कहीं अलग रहेंगे।”

मन मारकर शीतल को मौसा की बात माननी पड़ी। दिन में अपने ग्रुप में रही, लेकिन शाम होते ही मौसा उसे दूसरे होटल लिवा ले गए।

रात को अचानक उसने महसूस किया कि मौसा उसके अंगों को छू रहे हैं। उसने मौसा को मना किया, लेकिन मौसा बोले,
“तुझे देखते ही मेरे अंदर का शैतान जाग जाता था। मैं कब से ऐसे मौके की तलाश में था, अब हाथ आए मौके को कैसे छोड़ दूं?”

शीतल फफक-फफक कर रोने लगी।

उसकी व्यथा सुनते ही मुखिया गुस्से से लाल-पीली हो गई, “इन्सान इतना भी नीचे गिर सकता है, सोचा भी नहीं जा सकता। इन इन्सानों से तो हम हिजड़े ही अच्छे हैं। बेटी, अभी तू हमारे साथ चल, कल तेरे मौसा को भी देखेंगे।”

“नहीं, मुझे वहां नहीं जाना। उनके पास गए तो वो अब चाहे कुछ न कहें, मगर मौका मिलते ही फिर वही हश्र होगा। मैं चिट्ठी लिखकर आई हूं कि मैं आत्महत्या करने जा रही हूं।”

एक सप्ताह तक पुलिस की मदद से मौसा और स्कूल वालों ने बहुत ढूंढा। कोई खबर न मिलने पर सब वापिस अम्बाला आ गए।

इधर मंगलामुखी परिवार ने शीतल को घर के अंदर ही रखा ताकि उस पर किसी की नज़र न पड़े।
अपने आप को उनके घर में कैद देख, शीतल घबरा गई कि कहीं मंगलामुखी उसे भी अपने जैसा न बना दें।

उसकी घबराहट को देखकर मुखिया बोली,
“बेटी, घबराओ मत। हम इन्सानों जैसे दोगले नहीं हैं। हमने अब तक तुम्हें बाहर इसलिए नहीं निकलने दिया ताकि तुम्हें कोई देख न ले।”

फिर उन्होंने शीतल को एक सुरक्षित अनाथालय में पहुंचा दिया, और जीवन में कभी उससे न मिलने और अपने अतीत को भूलने का वादा लेकर उसे वहां छोड़ गए। वहां रहकर उसने पढ़ाई की और आज शीतल एक इंजीनियर के रूप में उनके सामने थी।

“बेटी, कभी रिश्तों को बचाने के लिए मौन धारण करना पड़े तो कर लेना। कभी-कभी लब खोलने पर बनते रिश्ते बिगड़ सकते हैं। तुम्हारा परिवार सदा खुशहाल रहे, यही दुआ देते हैं,” कह कर मंगलामुखियों की मुखिया शीतल को आंखों से कुछ न बोलने का वादा कराते हुए अपनी टोली के साथ खुशी-खुशी चली गई।

छवि सौजन्य: https://www.pexels.com/@thisisengineering/
अगर आपको शीतल की कहानी पसंद आई, तो नीचे अपनी राय और अनुभव साझा करें—I would love to hear your thoughts!

– प्रेम बजाज

लेखक परिचय: प्रेम बजाज

प्रेम बजाज एक गृहणी और लेखक हैं, जिनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं जैसे गृहशोभा, सरिता, मुक्ता, मनोहर कहानियाँ और सरस सलिल में प्रकाशित हो चुकी हैं।

उनकी अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें दो काव्य संग्रह, एक कहानी संग्रह (भावों का संपुट), एक आलेख संग्रह (क्रिटिसिज़्म), एक हॉरर उपन्यास (शापित कन्या), एक प्रेम उपन्यास (My Silent Love) और एक नर्सरी राइम्स बुक (सुनहरा बचपन) शामिल हैं। प्रेम बजाज का लेखन पाठकों के दिलों को छूने की क्षमता रखता है और जीवन के विविध पहलुओं को गहरे और सशक्त तरीके से प्रस्तुत करता है।

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