हिन्दी भाषी परिवार में जन्म हुआ। परिवार की वार्तालाप और बोलचाल की भाषा हिन्दी थी। अवधी का असर स्पष्ट था।
बचपन के शब्द, जिनका अर्थ माता-पिता और मैं ही समझ सकते थे — मम्म, प्याली, गुड़िया, छुइ, मुई, लूका-छिप्पी, हप्पा, भुक्की — न जाने कब उस प्रिय खेल के गीत बन गए… गुगु मैया, तैली तिल्लया… अक्क बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी, नब्बे पूरे सौ…
और फिर आई वर्णमाला — अ से अनार, आ से आम, इ से इमली… गीता प्रेस की हिन्दी पुस्तक-1 ने पूरी वर्णमाला, मात्रा ज्ञान, गिनती और प्रार्थना “हम हैं नन्हे-नन्हे बालक…” से संपूर्ण संसार का ज्ञान दिला दिया।
हिन्दी समाचार पत्र ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ तथा पत्रिका ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, बाल मासिक पत्रिका ‘नंदन’ हमारे परिवार के प्रिय साथी थे। महान लेखक-लेखिकाएँ जैसे फनेश्वर नाथ ‘रेणु’, जयप्रकाश भारती, शिवानी, मन्नू भंडारी की नैतिक, रोचक, सामाजिक कहानियाँ कब हमारे मन-मस्तिष्क में उतर गईं, कह नहीं सकती।
पड़ोस में आने वाली पत्रिकाएँ धर्मयुग, चंदामामा, पराग, कल्याण, कादम्बरी ने जिज्ञासा से अटूट रिश्ता बना दिया।
रोज प्रातः माँ के स्नान के साथ ही रामचरितमानस का केवट संवाद —
“माँगी नाव न केवट आना… कहि तुम्हार मर्म मैं जाना…
पिय हिय की सिया जानन हारी… मन मुद्रिका मन मुदित उतारी…
केवट चरण गए अकुलाए… आज मैं काह न पावा…
मिटे दोष, दुःख, दरिद दावा…”
— से कविता-प्रेम अंतरमन में बस गया। दोहा, चौपाई, सोरठा समझ में आने लगे।
प्रारम्भिक जीवन में रेडियो मनोरंजन का सशक्त साधन था। आकाशवाणी, दिल्ली ‘ए’ से बृज माधुरी, प्रातः आठ बजे और रात्रि पौने नौ के समाचार ने संसार भर से जोड़ दिया।
रविवार को बच्चों का कार्यक्रम, मधुर फिल्मी गीत, बहनों का कार्यक्रम — जीवन के विभिन्न आयामों से संबंध बनाते गए।
जसदेव सिंह जी, नरोत्तम पुरी जी की क्रिकेट खेल-वर्णन शैली और गणतंत्र दिवस का आँखों देखा हाल रोमांच से भर देता था। यह हिन्दी से लगाव ही था।
धीरे-धीरे विद्यालय में हिन्दी वाद-विवाद, कविता-पाठ, हिन्दी लेखन में रुचि बढ़ती गई। प्रोत्साहन मिलता रहा और हिन्दी में अभिव्यक्ति करना खुशी देने लगा।
सार्वजनिक रूप से हिन्दी में अपने विचार प्रस्तुत करने का प्रथम अवसर महात्मा गाँधी जन्म-शताब्दी के अवसर पर आया। सहपाठियों को संबोधित करने का रोमांच और शिक्षकों के प्रोत्साहन ने हिन्दी से नाता और सुदृढ़ कर दिया।
मातृभाषा दिवस सितम्बर में विदेशों में हिन्दी के विस्तार के संदर्भ में पढ़ा तो गर्व हुआ। हिन्दी शब्दों का अंग्रेज़ी में अपनाया जाना यह समझाता है कि हर भाषा आदान-प्रदान से ही जीवित रहती है और बढ़ती है। विदेशी हिन्दी-प्रेमियों में कामिल बुल्के का नाम और कार्य स्मृति में अंकित हो गया।
पत्र-लेखन में मातृभाषा ही भावों को सही रूप में प्रेषित कर पाती थी। वे पत्र पढ़-लिखकर मन में ठंडक उतर जाती थी।
हिन्दी की अनेक बोलियाँ और उनके लोकगीत — अवधी, मैथिली, राजस्थानी, गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी, हैदराबादी, ब्रज भाषा, खड़ी बोली — विशेष अवसरों जैसे जौणार, अन्नप्राशन, सगाई, विवाह समारोह में सुनकर ऐसा लगता मानो एक बगीचे में अलग-अलग प्रजाति के पुष्प महक रहे हों।
लाल किले से विभिन्न प्रधानमंत्रियों के भाषण, विशेष रूप से पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी की शैली और स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी का संयुक्त राष्ट्र में दिया गया हिन्दी भाषण — हिन्दी भाषी होने के गौरव को और ऊँचा कर गया।
पिता जी एक अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में हिन्दी के शिक्षक थे। वर्षों के अथक प्रयासों को सम्मानित करते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार प्रदान किया गया।
शुद्ध हिन्दी भी आसपास बोली जाती थी। पड़ोसी एंग्लो-इंडियन और विदेशी छात्रों के लिए ‘ट’ वर्ग के अक्षर अत्यंत कठिन थे। संयुक्त अक्षर भी आसान न थे। स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, नपुंसकलिंग का भेद उन्हें अजीब लगता। कर्ता-क्रिया का मेल कठिन प्रतीत होता, फिर भी हिन्दी सिखाना ध्येय था। हिन्दी-सेवा का यह सम्मान हमारे पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय बन गया।
हिन्दी लेखन में आनंद आने से प्रतिदिन कुछ न कुछ लिख-पढ़ लेती हूँ। लघु उपन्यास, कहानियाँ और कविताएँ भी प्रकाशित हो चुकी हैं।
हिन्दी के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते। मातृभाषा का संबंध अंतरमन से होता है।
हिन्दी मेरे लिए मात्र मातृभाषा नहीं, मेरे जीवन की धुरी है। मुझे विश्वास है कि अपनी मातृभाषा से जुड़कर सभी को आनंद की अनुभूति होती है। अपने जीवन-मूल्य हमें मातृभाषा से ही प्राप्त होते हैं। मातृभाषा में ही सपने संजोए जाते हैं और मातृभाषा में ही वे पूरे होते हैं।
मातृभाषा कहीं भी, कभी भी सुनने पर अपनापन स्वतः ही महसूस होता है।
अगर इस ब्लॉग ने आपको आपकी अपनी मातृभाषा की याद दिलाई हो, तो नीचे टिप्पणी में अपनी भावनाएँ अवश्य साझा करें।
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– मधु मेहरोत्रा

About The Writer:
Madhu Mehrotra is a prolific writer and thoughtful storyteller whose literary works reflect the simplicity of hill life, human emotions, and social consciousness. She has authored several notable books, including:
- Of Hills N Vales – Articles reflecting life in the hills
- Turbulence and Tranquility in Trains – Experiences and emotions of train travel
- The Child in Us – Childhood memories and reflections
- Gems of Short Fiction – Short stories exploring various emotions
- Where The Rhododendron Blooms – Poetry on nature and its beauty
- All Weather Tales – Stories spanning diverse themes
- The Bridge And Other Stories – Urban fantasy and human relationships
- Affectionate Echoes – A Romantic Anthology, Volume I – Nuances of love and romance
- In Pursuit of Perseverance – Tales of determination and resilience
Through her writing, she brings alive the lives of ordinary people, the beauty of nature, and the heartfelt stories that connect us all.
She says, “I have lived my life in the hills — fleeting, serene, here today, gone tomorrow.”



