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मुंबई की बारिश की कहानी

A couple sits close under an umbrella, embracing on a rainy city day.

मुंबई कभी सो नहीं पाती, और उसकी बारिश कभी रुकती नहीं। वो सिर्फ़ पानी नहीं लाती—वो पुरानी यादें, अधूरे वादे और वो सारी बातें लाती है जो कभी कह नहीं पाईं। Marine Drive की लहरें आज भी टकराती हैं, जैसे कह रही हों—“कुछ नहीं बदला, बस तुम दोनों अलग हो गए।”

उस शाम अनन्या और विक्रम Marine Drive पर पहुँचे तो बारिश पहले से ही शहर को भिगो चुकी थी। पानी सड़क पर बह रहा था, लहरें दीवार पार करके पैर छू रही थीं। विक्रम ने अनन्या का हाथ पकड़ा—कितनी देर तक, जैसे अगर छोड़ा तो कभी नहीं मिलेगा। अनन्या की साड़ी भीगकर उसके शरीर से चिपक गई थी, बाल गीले, आँखें लाल। वो रो नहीं रही थी—बस चुप थी। चुप्पी जो कभी-कभी रोने से ज़्यादा दर्द देती है।

“विक्रम… मैंने पैकिंग शुरू कर दी है।” अनन्या ने धीरे से कहा, आवाज़ में कंपन था। “सिर्फ़ दो हफ्ते। फिर एयरपोर्ट। फिर… नई ज़िंदगी।”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। बस उसे और कसकर पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी हो चुकी थीं—बारिश की वजह से, या दर्द की वजह से।

“तुम्हें पता है न,” अनन्या बोली, “हर सुबह जब मैं लोकल पकड़ती थी, तुम्हारी याद आती थी। अंधेरी से बांद्रा तक का वो सफर… तुम्हारी सीट पर बैठकर मैं सोचती थी कि काश तुम साथ होते। अब वो सफर भी खत्म हो जाएगा।”

विक्रम ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू गिरे—बारिश में घुल गए। “मैंने सोचा था… एक दिन हम दोनों साथ Marine Drive पर बैठेंगे। कोई छाता नहीं, कोई जल्दबाज़ी नहीं। बस हम। पर अब… तुम उड़ रही हो, और मैं यहाँ कीचड़ में फँसा रह जाऊँगा।”

अनन्या ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। दोनों की नाकें छू रही थीं। बारिश उनके बीच से गुजर रही थी।

“मुझे माफ़ कर देना, विक्रम। मैं डर गई थी। डर गई थी कि अगर मैं रुक गई, तो हम दोनों की ज़िंदगी रुक जाएगी। मुंबई की ये बारिश हमें भिगोती रहेगी, लेकिन सपने नहीं पूरे होंगे। मैं तुम्हें वो नहीं दे पाऊँगी जो तुम डिज़र्व करते हो।”

विक्रम ने उसे गले लगा लिया। इतना ज़ोर से कि जैसे सारी मुंबई की बारिश रोक लेना चाहता हो। “तुम मुझे सब कुछ दे चुकी हो, अनन्या। तुम्हारी हर मुस्कान, हर मैसेज, हर वो शाम जब हम Marine Drive पर आइसक्रीम खाते थे। वो सब मेरे पास है। बस अब… वो सब यादों में रह जाएगा।”

दोनों Marine Drive की दीवार पर बैठ गए। पैर पानी में लटकाए। लहरें आतीं, छूतीं, और चली जातीं—जैसे उनके प्यार की तरह। अनन्या ने विक्रम का सिर अपनी गोद में रखा। उसकी उँगलियाँ उसके बालों में फेर रही थीं।

“हर बारिश में मुझे याद करोगे?” अनन्या ने पूछा, आवाज़ टूटते-टूटते।

“हर बारिश में।” विक्रम बोला। “जब भी ट्रेन रुकेगी पानी में, जब भी Marine Drive डूबेगा, जब भी बादल गरजेंगे… मैं सोचूँगा कि काश मैंने तुम्हें रोक लिया होता। काश मैंने कहा होता—‘मत जाओ, मेरे बिना मत जाओ।’ पर मैं कह नहीं पाया… क्योंकि प्यार में कभी-कभी रोकना सबसे बड़ा अन्याय होता है।”

अनन्या रो पड़ी। सिसकियाँ तेज़ हो गईं। वो विक्रम से लिपटी रही, जैसे आखिरी बार। बारिश अब और तेज़ हो गई थी। लहरें ऊँची उठ रही थीं। मुंबई की वो रोशनी पानी में चमक रही थी—दोगुनी, लेकिन उदास।

फिर अनन्या उठी। उसने अपना छोटा-सा बैग उठाया। छाता टूट चुका था।

“अलविदा, विक्रम।”

विक्रम खड़ा हो गया। उसने अनन्या को एक आखिरी बार देखा—गीली आँखों से, टूटे दिल से। “अलविदा नहीं… बस इतना कि… कभी मत भूलना कि मुंबई में कोई है जो हर बारिश में तुम्हारे लिए भीगता है।”

अनन्या मुड़ी। वो चल पड़ी। कदम पानी में छपाक मारते हुए। पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्योंकि अगर देखती, तो शायद वो टिकट फाड़ देती। शायद एयरपोर्ट न जाती।

विक्रम वहीं खड़ा रहा। Marine Drive पर। भीगा हुआ। अकेला। लहरें उसके पैर छू रही थीं। दूर से लोकल की आवाज़ आ रही थी—जो पानी में फँसी हुई थी, जैसे उसका दिल।

आज भी, जब मुंबई में बारिश होती है, विक्रम Marine Drive जाता है। अकेला। भीगता है। और फुसफुसाता है—

“काश मैंने उस दिन कहा होता… मत जाओ।
काश हम दोनों मुंबई की इस बारिश में हमेशा के लिए डूब जाते।
काश प्यार रोकने लायक होता।”

पर मुंबई की बारिश रुकती नहीं। वो बस बहती रहती है—यादों के साथ, दर्द के साथ, और एक अधूरे प्यार के साथ।

छवि सौजन्य: https://www.pexels.com/@eren-hizli-852638760/
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– मुकेश कुमार बिस्सा

मुकेश कुमार बिस्सा, स्वर्गीय कन्हैया लाल बिस्सा के सुपुत्र, राजस्थान के जैसलमेर के निवासी हैं। जन्म 29 जनवरी 1975 को हुआ। उन्होंने एम.एससी. एवं बी.एड. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं और केन्द्रीय विद्यालयों में व्यवसायिक प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (गणित) के रूप में कार्यरत रहे हैं। शिक्षा और शिक्षण में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

लेखन और साहित्य के क्षेत्र में मुकेश कुमार बिस्सा का नाम प्रतिष्ठित है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – एक स्पर्श, एक एहसास, काव्यांजलि, अभिव्यक्ति, सफर ए जिंदगी, मंथन। इसके अलावा उन्होंने साझा काव्य संकलनों में भी योगदान दिया है जैसे – आयाम, साहित्यनामा, तिनके का सफर, एक कप चाय और जिंदगी, सुनहरी किरणें, काव्याश्रम

उन्हें साहित्यिक और शिक्षण के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, रामकृष्ण राठौड़ पुरस्कार, नवीन कदम सर्वश्रेष्ठ लेखक पुरस्कार, संस्कार भारती पुरस्कार, रोटरी क्लब सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार, लायंस क्लब सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार, इंटरनेशनल बुक ऑफ वर्ल्ड पुरस्कार, महात्मा गांधी साहित्य सम्मान आदि शामिल हैं।

मुकेश कुमार बिस्सा के लेखन में जीवन की संवेदनाएँ, भावनात्मक गहराई और अनुभवों का अनूठा प्रतिबिंब मिलता है। उनकी रचनाएँ पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं और उन्हें सोचने पर मजबूर करती हैं।

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