मनुष्य ने जब पहली बार इस धरती पर आँखें खोली होंगी, तब उसके सामने सबसे पहले प्रकृति ही रही होगी—खुला आकाश, बहती नदियाँ, ऊँचे पर्वत, पेड़ों की छाया और पक्षियों का संगीत। प्रकृति ही उसका पहला घर थी, पहला शिक्षक और पहला आश्रय।
आज विज्ञान और तकनीक के इस युग में भले ही मनुष्य ने विकास की ऊँचाइयों को छू लिया हो, किंतु वह अब भी प्रकृति पर उतना ही निर्भर है जितना सदियों पहले था।
प्रकृति केवल हमारे जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं जीवन का आधार है। हमारी हर साँस पेड़ों से जुड़ी है, हर बूँद पानी नदियों और बादलों से, और हर अन्न का दाना मिट्टी से। यदि प्रकृति न रहे, तो मानव सभ्यता का अस्तित्व भी संभव नहीं रहेगा। फिर भी सबसे अधिक उपेक्षा मनुष्य ने उसी प्रकृति की की है, जिसने उसे सब कुछ दिया।
आज जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो महसूस होता है कि प्रकृति धीरे-धीरे थकने लगी है। शहरों का फैलता हुआ कंक्रीट, कटते जंगल, प्रदूषित नदियाँ और धुएँ से भरी हवा इस बात का प्रमाण हैं कि विकास की अंधी दौड़ में हमने संतुलन खो दिया है। कभी जो नदियाँ जीवन का गीत गाती थीं, आज वे कचरे और रसायनों के बोझ से कराह रही हैं। जिन जंगलों में पक्षियों की आवाजें गूंजती थीं, वहाँ अब मशीनों का शोर सुनाई देता है।
प्रकृति का संतुलन बिगड़ने का प्रभाव केवल वातावरण तक सीमित नहीं रहता, वह सीधे मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है। जलवायु परिवर्तन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है, कहीं भीषण सूखा पड़ रहा है। ऋतुएँ अपने समय से भटक रही हैं। गर्मी हर वर्ष नए रिकॉर्ड बना रही है और सर्दियाँ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं। यह सब प्रकृति की चेतावनी है कि यदि मनुष्य अब भी नहीं संभला, तो आने वाला समय और अधिक कठिन हो सकता है।
लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर हमारा दायित्व क्या है?
हमारा पहला दायित्व है—प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, संबंध मानना। जब तक हम धरती को केवल उपयोग की वस्तु समझते रहेंगे, तब तक उसका शोषण होता रहेगा। हमें यह समझना होगा कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक हिस्सा है। जिस दिन यह भावना भीतर जागेगी, उसी दिन संरक्षण की शुरुआत हो जाएगी।
पेड़ों की रक्षा करना आज सबसे बड़ा कर्तव्य बन चुका है। एक पेड़ केवल लकड़ी नहीं होता; वह छाया, वर्षा, ऑक्सीजन और अनगिनत जीवों का घर होता है। जब एक पेड़ कटता है, तो केवल तना नहीं गिरता, बल्कि उसके साथ कई जीवन भी प्रभावित होते हैं। इसलिए वृक्षारोपण केवल एक अभियान नहीं, बल्कि भविष्य बचाने का संकल्प होना चाहिए।
जल संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। पानी की हर बूँद आने वाले समय की अमानत है। यदि आज हमने जल को बचाने की आदत नहीं सीखी, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल नदियों की कहानियाँ सुनेंगी। वर्षा जल संचयन, जल की बर्बादी रोकना और नदियों को स्वच्छ रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
इसके साथ ही हमें अपनी जीवनशैली में भी बदलाव लाना होगा। प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, अनावश्यक संसाधनों की बर्बादी और अत्यधिक उपभोग प्रकृति को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं। छोटी-छोटी आदतें, जैसे कपड़े के थैले का उपयोग करना, बिजली और पानी बचाना, आसपास स्वच्छता रखना भी बड़े परिवर्तन ला सकती हैं।
प्रकृति के प्रति दायित्व केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। जब मनुष्य प्रकृति के करीब जाता है, तो उसके भीतर संवेदनाएँ जागती हैं। पेड़ों के बीच बैठना, बारिश को महसूस करना, मिट्टी की खुशबू को आत्मसात करना—यह सब मन को शांत करता है। शायद इसी कारण हमारे पूर्वज प्रकृति को पूजा के रूप में देखते थे। वे जानते थे कि प्रकृति का सम्मान करना, वास्तव में जीवन का सम्मान करना है।
आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि चेतना की है। यदि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझ ले, तो पृथ्वी को फिर से हरा-भरा बनाया जा सकता है। क्योंकि प्रकृति हमसे बदले में बहुत अधिक नहीं मांगती। उसे केवल थोड़ा सम्मान, थोड़ी संवेदना और थोड़ा संतुलन चाहिए।
अंततः यही कहा जा सकता है कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध साँस और शरीर जैसा है। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा। इसलिए समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा को बदलें और ऐसे भविष्य की कल्पना करें, जहाँ आधुनिकता और प्रकृति साथ-साथ चल सकें।
क्योंकि यदि पृथ्वी बची रहेगी, तभी हमारे सपने भी बचेंगे।
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– नमिता गुप्ता ‘मनसी’

लेखिका परिचय
नमिता गुप्ता ‘मनसी’ हिंदी साहित्य जगत की एक संवेदनशील और सक्रिय रचनाकार हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकों “मनसी.. मन की बातें” तथा “सूरज के सूरजमुखी” को पाठकों द्वारा सराहा गया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक साझा-संकलनों में भी अपनी लेखनी का योगदान दिया है। उनकी कविताएँ समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं जैसे मेरी सहेली, अमर उजाला की रूपायन, विभोम स्वर, कवि कुंभ, वनीता, तथा अमेरिका से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र हम हिंदुस्तानी और सेतू में प्रकाशित होती रही हैं।
वे इंस्टाग्राम के साहित्यिक समूह “शब्द हार” की कोर टीम का हिस्सा भी रह चुकी हैं तथा वर्तमान में साहित्यिक समूह “काव्यांश” का संचालन कर रही हैं। ऑनलाइन काव्य-गोष्ठियों में सक्रिय सहभागिता के साथ-साथ वे इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक पर कई लाइव साहित्यिक कार्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। उन्हें मेरठ के “महिला काव्य मंच” के अंतर्गत मंचीय काव्य पाठ का भी अनुभव प्राप्त है।



