आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर और प्रकृति पाँच तत्वों से बनी है—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, जिन्हें पंचमहाभूत कहा जाता है। यदि ये सभी तत्व संतुलन में हों तो हमारे तन और मन स्वस्थ रहते हैं।
इसी तरह प्रकृति भी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंश है, जिसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते। प्रकृति के प्रति हमारा बहुत बड़ा दायित्व है। हमारी सभी आवश्यकताएँ तथा सुख-समृद्धि हमें प्रकृति से प्राप्त होती हैं, इसलिए प्रकृति की रक्षा करना हमारा कर्तव्य और दायित्व है।
दायित्व क्या है……
साधारण भाषा में जिसे जिम्मेदारी या जिम्मेदार होना कहा जाता है। सरल शब्दों में, यदि हम किसी व्यक्ति से कोई वस्तु या धन उधार लेते हैं या बैंक से लोन लेते हैं, तो यह हमारा दायित्व होता है कि हम उसे वापस करें।
इसी प्रकार, प्रकृति हमें जो देती है, हमें उसे भी लौटाना होता है। जैसे प्रकृति ने हमें पेड़-पौधे दिए हैं, यदि हम केवल उन्हें काटते रहेंगे और नए पेड़ नहीं लगाएंगे, तो पृथ्वी पेड़-रहित हो जाएगी और जन-जीवन के लिए गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी।
प्रकृति को स्वच्छ और संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है।
प्रकृति के बारह तत्व हैं—जल, पृथ्वी, वायु, प्रकाश, अग्नि, वज्र, हिम, बल, समय, फूल, छाया और चंद्रमा।
हमारे जंगल, नदियाँ, महासागर और मिट्टी हमें भोजन, हवा और पानी प्रदान करते हैं। हम अपने स्वास्थ्य तथा सुख-समृद्धि के लिए इन सब पर निर्भर हैं। इसलिए इसे विश्व की प्राकृतिक पूंजी कहा जाता है।
लेकिन अहम प्रश्न यह है कि प्रकृति की सुरक्षा और स्वच्छता कैसे रखी जाए?
अधिक से अधिक पेड़ लगाकर, पेड़ न काटकर, अपने आसपास सफाई रखकर, प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझकर और लोगों को जागरूक करके हम प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं।
प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व है कि हम उसकी संरक्षा, सम्मान और संतुलन बनाए रखें।
हम जल, वायु और जंगल (प्राकृतिक संसाधनों) का समझदारी और किफायत से उपयोग करें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को इनकी कमी न झेलनी पड़े।
प्रदूषण कम करके भी हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
प्लास्टिक का उपयोग कम करें तथा कचरे को सड़क पर या इधर-उधर फेंकने के बजाय कूड़ेदान में डालें। कचरे को Reduce, Reuse, Recycle करके हवा और पानी को प्रदूषित होने से बचाएँ।
सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करके, घरों में ऊर्जा की बचत करके और बिजली का कम उपयोग करके हम अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम कर सकते हैं।
कार्बन फुटप्रिंट क्या है……
किसी उत्पाद द्वारा वातावरण में छोड़ी गई गैस (मुख्य रूप से कार्बन-डाइऑक्साइड CO₂) को कार्बन फुटप्रिंट कहा जाता है। यह ईंधन के उपयोग (पेट्रोल, डीज़ल, कोयला) और बिजली की खपत से उत्पन्न होती है।
यह परिवहन, बिजली उपयोग, खान-पान और वस्तुओं के उपभोग से बनती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन होता है।
इसे सौर ऊर्जा के उपयोग, ऊर्जा की बचत और पौधारोपण करके कम किया जा सकता है।
अर्थात, हमारी जीवनशैली पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करती है, यह समझना अत्यंत आवश्यक है।
वन्य जीवों की रक्षा (Biodiversity) करके हम प्राकृतिक आवासों को बचा सकते हैं।
ऊर्जा एवं खनिज पदार्थों का विवेकपूर्ण उपयोग करें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचे रहें।
जब अधिक पेड़ लगाए जाते हैं तो अधिक ऑक्सीजन मिलती है, कार्बन-डाइऑक्साइड कम होती है और मिट्टी सुरक्षित रहती है।
Sustainable development के माध्यम से हम प्रकृति के प्रति अपना सच्चा दायित्व निभा सकते हैं—अर्थात प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किए बिना उनका उपयोग करना, ताकि भावी पीढ़ियों के लिए भी संसाधन उपलब्ध रहें और पृथ्वी का स्वास्थ्य बना रहे।
प्रकृति से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है
जिस प्रकार पेड़-पौधे विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहते हैं, नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं और पेड़ अपना फल स्वयं नहीं खाते—इसी प्रकार प्रकृति हमें निस्वार्थता सिखाती है।
फूल समय पर खिलता है और फल समय आने पर पकता है—यह हमें धैर्य सिखाता है।
प्रकृति हमें सहनशीलता, ऊँचे लक्ष्य, परोपकार, संतुलन, सामंजस्य और जीवन के परिवर्तनों को स्वीकार करना सिखाती है।
प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है।
यह जीवन की सबसे बड़ी शिक्षक है, जो बिना भेदभाव सभी को समान रूप से संसाधन प्रदान करती है—जैसे सूर्य, चंद्रमा, नदियाँ और पेड़-पौधे सभी को समान ऊर्जा और छाया देते हैं।
रासायनिक उर्वरक और पर्यावरण
प्रकृति का संरक्षण करने के लिए हमें रासायनिक उर्वरकों (chemical fertilizers) और कीटनाशकों (pesticides) का उपयोग कम करना चाहिए। ये मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
अधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता नष्ट होती है (Soil degradation) और भूमि बंजर हो सकती है।
ये रसायन मिट्टी के सूक्ष्म जीवों और केंचुओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम हो जाती है।
इनका प्रभाव जल स्रोतों और भूजल (groundwater) पर भी पड़ता है, जिससे पानी दूषित हो जाता है।
इनसे मिट्टी का pH संतुलन बिगड़ जाता है और भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
इससे मनुष्यों और पशुओं में कई गंभीर बीमारियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
जैविक खेती क्या है?
जैविक खेती में मृदा को स्वस्थ रखते हुए केवल जैविक खाद और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है।
पहले के समय में लोग रसायनों का कम उपयोग करते थे, इसलिए भोजन अधिक स्वच्छ और स्वस्थ होता था। आज अत्यधिक रसायनों के कारण स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव बढ़ रहे हैं।
जैविक खेती से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बढ़ती है और यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित होती है।
उदाहरण के लिए, देशी गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन से बनी जैविक खाद मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारती है और सूक्ष्म जीवों की वृद्धि में सहायक होती है।
केंचुए मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और प्राकृतिक रूप से उसकी संरचना को सुधारते हैं।
जैविक खेती से उपज लंबे समय तक सुरक्षित रहती है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होती है।
यदि तंदुरुस्ती चाहिए तो प्राकृतिक खेती अपनाएँ—
उगाएँ जैविक, पकाएँ जैविक, खाएँ और खिलाएँ जैविक।
इससे हम अपने शरीर को स्वस्थ रखते हुए प्रकृति के प्रति अपना दायित्व भी निभा सकते हैं।
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यदि यह लेख आपको प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को समझने और अपनाने के लिए प्रेरित करे, तो अपनी सोच और सुझाव कमेंट में ज़रूर साझा करें।
– प्रेम बजाज

लेखक परिचय: प्रेम बजाज
प्रेम बजाज एक गृहणी और लेखक हैं, जिनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं जैसे गृहशोभा, सरिता, मुक्ता, मनोहर कहानियाँ और सरस सलिल में प्रकाशित हो चुकी हैं।
उनकी अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें दो काव्य संग्रह, एक कहानी संग्रह (भावों का संपुट), एक आलेख संग्रह (क्रिटिसिज़्म), एक हॉरर उपन्यास (शापित कन्या), एक प्रेम उपन्यास (My Silent Love) और एक नर्सरी राइम्स बुक (सुनहरा बचपन) शामिल हैं। प्रेम बजाज का लेखन पाठकों के दिलों को छूने की क्षमता रखता है और जीवन के विविध पहलुओं को गहरे और सशक्त तरीके से प्रस्तुत करता है।



